6.ग्यारह बजे की आवाज़ । Love shayari ।shayar mubaeak khan । Gazal ।

   ग्यारह बजे की चुप में जब दिल ने तुझे आवाज़ दी,

फिर धड़कनों की तेज़ उस हलचल ने क्या आवाज़ दी।


सोए हुए सब लोग थे, जागी हुई बस याद थी,

खामोश उस कमरे में इक पागल ने क्या आवाज़ दी। 



देखा जो मेरा नाम तो रोशन हुई मेरी सहर

उस कोने के पीछे छिपी ओझल ने क्या आवाज़ दी।


काँपे हुए हाथों से जब 'हैलो' लिखा था रात को,

फिर इश्क़ के उस पहले ही पल-छिन ने क्या आवाज़ दी।


बचपन की बातें, ख़्वाब, डर, और मुस्कुराना बिन कहे,

सादा से उन लफ़्ज़ों में उस कोमल ने क्या आवाज़ दी।


   -- शायर मुबारक खान --











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