कलाम-ए-वफ़ा | love shayari | sad shayari | urdu poetry
पुरानी धूल जो झाड़ी तो इक पैकर निकल आया
ज़माना कह रहा था तू फ़क़त मेरी अमानत है
तुझे देखा तो दिल सीने से ही बाहर निकल आया
सबक मासूमियत का जब कहा तूने दोबारा है
कलाम-ए-पाक पढ़ते ही मुक़द्दर जाग आया है
किताबें दरमियाँ थीं और हम खामोश बैठे थे
निगाहों से ही चाहत का हर इक दफ़्तर निकल आया
कहा तूने मुबारक आप के हैं सख़्त से लहजे
मगर उस एक हंसी में वफ़ा का दर निकल आया
सुना जब शहर जाने का तेरा क़िस्सा तो यूँ समझा
मिरी आँखों के रस्ते दिल का सब ज़ौहर निकल आया
दुआओं में तुझे माँगा तुझे सोचा तुझे पाया
मोहब्बत की तड़प में इश्क़ का महवर निकल आया
-- शायर मुबारक खान --
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